Saturday, May 18, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता - नवमोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता - नवमोऽध्यायः
|| संकलन - शिवदास || 

*श्री भगवानुवाच*
                   
*इदं तु मे गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। 
ज्ञानं विज्ञानसहितं यञ्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।*

*अर्थ-श्रीभगवान् बोले- तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान को पुनः भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जायेगा।।१।।*

*राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। 
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।२।।*

*अर्थ-यह विज्ञान सहित ज्ञा‌न सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बडा़ सुगम और अविनाशी है।।२।।*

*अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।३।।*

*अर्थ-हे परंतप ! इस उपर्युक्त धर्ममें श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसारचक्र में भ्रमण करते रहते हैं।।३।।*
                   
*मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। 
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।४।।*

*अर्थ-मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बरफ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किन्तु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।।४।।*

*न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। 
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।५।।*

*अर्थ-वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं; किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करनेवाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।।५।।*

*यथाकाशस्थितो नित्यं वायुःसर्वत्रगो महान्। 
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीयुत्युपधारय।।६।।*

*अर्थ-जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरनेवाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्पद्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ।।६।।*

                   
*सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। 
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।७।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! कल्पों के अन्त में सव भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ।।७।।*

*प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। 
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।।८।।*

*अर्थ-अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतन्त्र हुये इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ।।८।।*

*न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। 
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।।९।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते।।९।।*

                   
*मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। 
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।१०।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्व जगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसार चक्र घूम रहा है।।१०।।*

*अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रित्। 
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।११।।*

*अर्थ-मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़लोग मनुष्य का शरीर धारण कलनेवाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिये मनुष्यरूप में विचरते हुये मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं ।।११।।*

*मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। 
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।१२।।*

*अर्थ-वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विछिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं।।१२।।*
                   
*महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। 
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।१३।।*

*अर्थ-परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरन्तर भजते हैं।।१३।।*

*सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। 
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।१४।।*

*अर्थ-वे दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुये तथा मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करते हुये सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।।१४।।*

*ज्ञा‌नयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। 
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।१५।।*

*अर्थ-दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ के द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुये भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।।१५।।*

                   
*अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। 
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।।१६।।*

*अर्थ-क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ।।१६।।*

*पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। 
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ।।१७।।*

*अर्थ-इस सम्पूर्ण जगत् का धाता अर्थात् धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देनेवाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ ।।१७।।*

*गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। 
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।१८।।*

*अर्थ-प्राप्त होनेयोग्य परम धाम, भरण-पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखनेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करनेवाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थितका आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ।।१८।।*
                   
*तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। 
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।१९।।*

*अर्थ-मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।।१९।।*

*त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। 
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।२०।।*

*अर्थ-तीनों वेदों में विधान किये हुए सकामकर्मों को करनेवाले, सोमरस को पीनेवाले, पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अ‌पने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।।२०।।*

*ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। 
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्नागतागतं कामकामा लभन्ते।।२१।।*

*अर्थ-वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्यक्षीण होनेपर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेनेवाले और भोगों की कामनावाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात् पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं।।२१।।*
                   
*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। 
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।२२।।*

*अर्थ-जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्कामभावसे भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करनेवाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।।२२।।*

*येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। 
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।।२३।।*

*अर्थ-हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्‍धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं; किन्तु उनका वह पूजन अवधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है।।२३।।*

*अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। 
न तु मामभिजानन्ति तत्वेनातश्च्यवन्ति ते।।२४।।*

*अर्थ-क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्व से नहीं जानते, इसीसे गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं ।।२४।।*

                   
*यान्ति देवब्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः। 
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।।*

*अर्थ-देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिये मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।।२५।।*

*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। 
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।।*

*अर्थ-जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।।२६।।*

*यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। 
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।२७।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर ।।२७।।*

                   
*शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। 
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।२८।।*

*अर्थ-इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान् के अर्पण होते हैं -ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा ।।२८।।*

*समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। 
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।२९।।*

*अर्थ-मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।।२९।।*

*अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। 
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।३०।।*

*अर्थ-यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है ।।३०।।*
                   
*क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। 
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।३१।।*

*अर्थ-वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।।३१।।*

*मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। 
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।३२।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि-चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं।।३२।।*

*किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। 
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।।३३।।*

*अर्थ-फिर इसमें तो कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते हैं । इसलिये तू सुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर ।।३३।।*

*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। 
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ।।३४।।*

*अर्थ-मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा करनेवाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा ।।३४।।*

*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः।।९।।*

*जय बाबा की* - शिवदास *

* श्रीमद्भगवद्गीता - अथाष्टमोऽध्यायः *

* श्रीमद्भगवद्गीता - अथाष्टमोऽध्यायः *
संकलन - शिवदास 


*अर्जुन उवाच*
                   
*किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। 
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।१।।*

*अर्थ-अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं ।।१।।*

*अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। 
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।२।।*

*अर्थ-हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस शरीर में कैसे है ? तथा युक्तचित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं।।२।।*

*श्रीभगवानुवाच*

*अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। 
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः।।३।।*

*अर्थ-श्रीभगवान् ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है।।३।।*

                   
*अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। 
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।४।।*

*अर्थ-उत्पति-विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूप से अधियज्ञ हूँ ।।४।।*

*अन्तकाले च मामेव स्मन्मुक्त्वा कलेवरम्। 
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।५।।*

*अर्थ-जो पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।५।।*

*यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। 
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।६।।*

*अर्थ-हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है; क्यों कि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।।६।।*
                   
*तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। 
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मावैष्यस्यसंशयम्।।७।।*

*अर्थ-इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर । इस प्रकार मुझ में अर्पण किये हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा ।।७।।*

*अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। 
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थनुचिन्तयन्।।८।।*

*अर्थ-हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है ।।८।।*

*कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयां-समनुस्मरेद्य। 
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।९।।*

*अर्थ-जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है ।।९।।*
                   
*प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । 
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स  तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।।१०।।*

*अर्थ-वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है ।।१०।।*

*यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। 
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ।।११।।*

*अर्थ-वेद के जानने वाले विद्वान् जिस सच्चिदानंदघनरूप परमपद को अविनाशी कहते हैं, आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्मा जन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपद को चाहनेवाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परमपद को मैं तेरे लिये संक्षेप से कहूँगा ।।११।।*
                   
*सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। 
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।*

*ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। 
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।१३।।*

*अर्थ-सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परमगति को प्राप्त होता है ।।१२-१३।।*
                   
*अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। 
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।१४।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्म को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ।।१४।।*

*मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। 
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ।।१५।।*

*अर्थ-परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।।१५।।*

*आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। 
मामुपेत्य तु कोन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।१६।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल के द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं।।१६।।*
                   
*सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः। 
रात्रि युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रिविदो जनाः।।१७।।*

*अर्थ-ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतक की अवधिवाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगीतक की अवधिवाली जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जाननेवाले हैं ।।१७।।*

*अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। 
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके।।१८।।*

*अर्थ-सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्मशरीर में ही लीन हो जाते हैं।।१८।।*

*भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। 
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।।१९।।*

*अर्थ-हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न होकर प्रकृति के वश में हुआ रात्रि के प्रवेशकाल में लीन होता है और दिन के प्रवेशकाल में फिर उत्पन्न होता है ।।१९।।*
                   
*परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तात्सनातनः। 
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।२०।।*

*अर्थ-उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है, वह परमदिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता।।२०।।*

*अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। 
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।२१।।*

*अर्थ-जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्तभाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परमधाम है।।२१।।*

*पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। 
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।२२।।*

*अर्थ-हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अर्न्तगत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से वह समस्त जगत् परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है ।।२२।।*

                   
*यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। 
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।२३।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! जिस काल में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात् दोनों मार्गों को कहूँगा।।२३।।*

*अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। 
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।२४।।*

*अर्थ-जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता है, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्लपक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकरगये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रमसे ले जाये जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।२४।।*

*धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। 
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।२५।।*

*अर्थ-जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से लेगया हुआ चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है।।२५।।*
                   
*शुक्लकृष्णे गतीह्येते जगतः शाश्वते मते। 
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।।२६।।*

*अर्थ-क्योंकि जगत् के ये दो प्रकार के - शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक के द्वारा गया हुआ-जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परम गति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।।२६।।*

*नैने सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। 
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।२७।।*

*अर्थ-हे पार्थ ! इस प्रकार दोनों मार्गों को तत्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता । इस कारण हे अर्जुन ! तू सब काल में समबुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात निरन्तर मेरी प्राप्ति के लिये साधन करने वाला हो।।२७।।*

*वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। 
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।२८।।*

*अर्थ-योगीपुरुष इस रहस्य को तत्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्नाप्त होता है ।।२८।।*

*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ।।८।।*


* जय बाबा की * - *शिवदास*

Thursday, May 16, 2019

* श्रीमद्भगवद्गीता सप्तमोऽध्यायः *

* श्रीमद्भगवद्गीता सप्तमोऽध्यायः *
संकलन - शिवदास 

                   
*मय्यासक्तयनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। 
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।।१।।*

*अर्थ-श्रीभगवान बोले-हे पार्थ ! अनन्यप्रेम से मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन ।।१।।*

*ज्ञानं तेअहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। 
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोअन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।।२।।*

*अर्थ-मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्वज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता ।।२।।*

*मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः।।३।।*

*अर्थ-हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करताऔर उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात् यथार्त रूप जानता है ।।३।।*
                   
*भूमिरापोअनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। 
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।४।।*

*अपरमेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। 
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।५।।*

*अर्थ- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अंहकार भी- इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है । यह आठ प्रकार के भेदोंवाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो ! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया है,  मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान ।।४-५।।*

*एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । 
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।६।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होनेवाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण हूँ ।।६।।*
                   
*मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। 
मयि सर्वमिदमं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।।७।।*

*अर्थ-हे धनञ्जय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में सूत्र के मनियों के सदृश मुझ में गुँथा हुआ है ।।७।।*

*रसोअहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। 
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।।८।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ ।।८।।*

*पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्र्चास्मि विभावसौ। 
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्र्चास्मि तपस्विषु ।।९।।*

*अर्थ-मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ ।।९।।*
                   
*बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। 
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।१०।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान । मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ ।।१०।।*

*बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। 
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोअस्मि भरतर्षभ ।।११।।*

*अर्थ- हे भरतश्रेष्ठ ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम हूँ ।।११।।*

*ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । 
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।।१२।।*

*अर्थ-और भी जो सत्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होनेवाले भाव हैं, उन सबको तू ' मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं ।।१२।।*

                   
*त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । 
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्यम्।।१३।।*

*अर्थ-गुणों के कार्यरूप सात्विक, राजस और तामस-इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार-प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता ।।१३।।*

*दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । 
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।।१४।।*

*अर्थ-क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी  माया बडी़ दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं ।।१४।।*

*न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। 
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।१५।।*

*अर्थ-माया के द्वारा जिनका ज्ञा‌न हरा जा चुका है ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़लोग मुझको नहीं भजते ।।१५।।*
                   
*चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोअर्जुन। 
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञा‌नी च भरतर्षभ ।।१६।।*

*अर्थ-हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम करने वाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी-ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं ।।१६।।*

*तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । 
प्रियो हि ज्ञानिनोअत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।१७।।*

*अर्थ- उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ।।१७।।*

*उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । 
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ।।१८।।*

*अर्थ-ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप ही है-ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धि वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गति स्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है ।।१८।।*

                   
*बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । 
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।१९।।*

*अर्थ-बहुत जन्मों के अन्त में तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है-इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ।।१९।।*

*कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। 
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।।२०।।*

*अर्थ-उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञा‌न हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात् पूजते हैं ।।२०।।*

*यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । 
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदयाधाम्यहम्।।२१।।*

*अर्थ-जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्‍धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ ।।२१।।*

*स तया श्रद्‍धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । 
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ।।२२।।*

*अर्थ-वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त करता है ।।२२।।*

*अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । 
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।।२३।।*

*अर्थ- परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान् है तथा वे देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं ।।२३।।*

*अव्यक्तं व्यक्तमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। 
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।*

*अर्थ-बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं ।।२४।।*
                   
*नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। 
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।२५।।*

*अर्थ-अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है ।।२५।।*

*वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। 
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होनेवाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्‍धा-भक्ति रहित पुरुष नहीं जानता ।।२६।।*

*इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्दमोहेन भारत। 
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।*

*अर्थ-हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वन्दरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं ।।२७।।*

                   
*येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। 
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।२८।।*

*अर्थ-परन्तु निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोह से युक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं ।।२८।।*

*जरामरणमोक्षाय मामश्रित्य यतन्ति ये । 
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ।।२९।।*

*अर्थ-जो मेरे शरण होकर जरा मरण से छूटने के लिये यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।२९।।*

*साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। 
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्यक्तचेतसः।।३०।।*

*अर्थ- जो पुरुष अधिभूत और आधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात् प्राप्त हो जाते हैं ।।३०।।*

*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम  सप्तमोऽध्यायः।।७।।*

* जय बाबा की - *शिवदास*

*श्रीमद्भगवद्गीता - षष्ठो ऽध्यायः *

*श्रीमद्भगवद्गीता - षष्ठो ऽध्यायः *
संकलन - शिवदास 

*श्रीभगवानुवाच*
                   
*अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। 
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।१।।*

*अर्थ-श्रीभगवान् बोले-जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है ।।१।।*

*यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। 
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।२।।*

*अर्थ-हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।।२।।*

*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। 
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।३।।*

*अर्थ-योग में आरूढ़ होने की इच्छावाले मननशील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्कामभाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्व संकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।।३।।*
                   
*यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। 
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।४।।*

*अर्थ-जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ।।४।।*

*उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। 
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।५।।*

*अर्थ-अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।।५।।*

*बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। 
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।६।।*

*अर्थ-जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है , उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में वर्तता है ।।६।।*
                   
*जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। 
शीतोष्णसुखःदुखेषु तथा मानापमानयोः।।७।।*

*अर्थ-सरदी-गरमी और सुख-दुखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञा‌न में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है अर्थात् उसके ज्ञा‌न में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं ।।७।।*

*ज्ञा‌नविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। 
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।८।।*

*अर्थ-जिसका अन्तःकरण ज्ञा‌न-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है ।।८।।*

*सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्य बन्धुषु। 
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।९।।*

*अर्थ-सुहृदय, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में, और पापियों में भी समानभाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।।९।।*
                   
*योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। 
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।१०।।*

*अर्थ-मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगावे ।।१०।।*

*शुचौ देशे प्रतिष्ठाय स्थिरमासनमात्मनः। 
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।११।।*

*अर्थ-शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं , जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके-।।११।।*

*तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। 
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।१२।।*

*अर्थ-उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धिके लिये योग का अभ्यास करे ।।१२।।*
                   
*समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। 
सम्प्रेक्ष्य नाशिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ।।१३।।*

*अर्थ-काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभागपर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ-।।१३।।*

*प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिब्रते स्थितः। 
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।१४।।*

*अर्थ-ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझ में चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे ।।१४।।*

*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। 
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।१५।।*

*अर्थ-वश में किये हुए मन वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है।।१५।।*
                   
*नात्यश्र्नतस्तु योगोअस्ति न चैकान्तमनश्र्नतः। 
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।१६।।*

*अर्थ-हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवाले का, न बिलकुल न खानेवाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाववाले का और न सदा जागनेवाले का ही सिद्ध होता है ।।१६।।*

*युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। 
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।१७।।*

*अर्थ-दुःखों का नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करनेवाले का और यथायोग्य सोने तथा जागनेवाले का ही सिद्ध होता है।।१७।।*

*यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। 
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।१८।।*

*अर्थ-अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिसकाल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है।।१८।।*

                   
*यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोमपा स्मृता। 
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।१९।।*

*अर्थ-जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गयी है।।१९।।*

*यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। 
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ।।२०।।*

*अर्थ-योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है ।।२०।।*

*सुखमात्यन्तिक यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। 
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः।।२१।।*

*अर्थ-इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है; उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरुप से विचलित होता ही नहीं।।२१।।*
                   
*यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। 
यस्मिन्स्थितो न दुखेन गुरुणापि विचाल्यते।।२२।।*

*अर्थ-परमात्मा की प्राप्तिरूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्था में स्थित योगी बडे़ भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता ।।२२।।*

*तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्। 
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोअनिर्विण्णचेतसा।।२३।।*

*अर्थ-जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है; उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुये अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ।।२३।।*

*सङ्कल्पप्रभान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। 
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः।।२४।।*

*अर्थ-संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेषरुप से त्यागकर और मन के द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर-।।२४।*
                   
*शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया। 
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।२५।।*

*अर्थ-क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे।।२५।।*

*यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। 
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।२६।।*

*अर्थ-यह स्थिर न रहने वाला और चञ्चल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे ।।२६।।*

*प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। 
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।२७।।*

*अर्थ-क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनन्द प्राप्त होता है ।।२७।।*
                   
*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। 
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।।*

*अर्थ-वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्तिरूप अनन्त आनन्द का अनुभव करता है।।२८।।*

*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । 
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।२९।।*

*अर्थ-सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थितरूप योग से युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है ।।२९।।*

*यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । 
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।३०।।*

*अर्थ-जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ।।३०।।*
                   
*सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। 
सर्वथा वर्तमानोअपि स योगी मयि वर्तते ।।३१।।*

*अर्थ-जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझ में ही बरतता है ।।३१।।*

*आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योअर्जुन। 
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।।३२।।*

*अर्थ-हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सब में सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।।३२।।*

*योअयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। 
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।३३।।*

*अर्थ-अर्जुन बोले- हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चञ्चल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ।।३३।।*
                   
*चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । 
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।३४।।*

*अर्थ-क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन बडा़ चञ्चल, प्रमथन स्वभाववाला, बडा़ दृढ़ और बलवान् है। इसलिये उसका वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ ।।३४।।*

*श्रीभगवानुवाच*

*असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। 
अभ्यासेन तु कोन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।३५।।*

*अर्थ-श्रीभगवान् बोले-हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है ।।३५।।*

*असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः। 
वश्यात्मना तु यतता शक्योअवाप्तुमुपायतः।।३६।।*

*अर्थ-जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किये हुये मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है-यह मेरा मत है ।।३६।।*

*अर्जुन उवाच*      
       
*अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। 
अप्राप्य योगसंसिद्धं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।३७।।*

*अर्थ-अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण ! जो योग में श्रद्‍धा रखने वाला है; किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कार को प्राप्त न होकर किस गति को प्राप्त होता है।।३७।।*

*कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। 
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।३८।।*

*अर्थ-हे महाबाहो ! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता ?।।३८।।*

*एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। 
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।३९।।*

*अर्थ-हे श्रीकृष्ण ! मेरे इस संशय को सम्पूर्णरुप से छेदन करने के लिये आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है।।३९।।*

*श्रीभगवानुवाच*
                   
*पार्थ नैवह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। 
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ।।४०।।*

*अर्थ-श्रीभगवान् बोले-हे पार्थ ! उस पुरुष का न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोक में ही। क्योंकि हे प्यारे ! आत्मोद्धार के लिये अर्थात् भगवत्प्राप्ति के लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ।।४०।।*

*प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। 
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोअभिजायते।।४१।।*

*अर्थ-योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है ।।४१।।*

*अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। 
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ।।४२।।*

*अर्थ-अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञा‌नवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है।।४२।।*

*तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। 
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।४३।।*

*अर्थ-वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात् समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिये पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है ।।४३।।*
                   
*पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोअपि सः। 
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।४४।।*

*अर्थ-वह श्रीमानों के घर में जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान् की ओर आकर्षित किया जाता है, तथा समबुद्धिरूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है ।।४४।।*

*प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः। 
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।।४५।।*

*अर्थ-परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कार बल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है ।।४५।।*

*तपस्विभ्योअधिको योगी ज्ञानिभ्योअपि मतोअधिकः। 
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।४६।।*

*अर्थ-योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन ! तू योगी हो।।४६।।*

*योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। 
श्रद्‍धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः।।४७।।*

*अर्थ-सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्‍धावान् योगी मुझमें लगे हुये अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है ।।४७।।*

*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोअध्यायः।।६।।*
               
*जय बाबा की *

*शिवदास*

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः  संकलन - शिवदास  अर्जुन उवाच                   सन्नासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।  त्या...