Sunday, December 22, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 
अर्जुन उवाच        
         सन्नासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। 
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले-हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ।।१।।

श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः। 
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।२।।

अर्थ-श्रीभगवान बोले-कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समहते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।।२।।

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। 
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।३।।

अर्थ-कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।।३।।
                     
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। 
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधिः सम्प्रकीर्तितः।।४।।

अर्थ-हे पुरुष श्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन । क्योंकि त्याग सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है।।४।।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। 
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।५।।

अर्थ-यज्ञ,दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।।५।।

एतान्यपि तु कर्माणि संङ्गत्यक्त्वा फलानि च। 
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।।६।।

अर्थ-इसलिये हे पार्थ ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।६।।
                     
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते। 
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ।।७।।

अर्थ-(निषिद्ध और काम्य कर्मो का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है । इसलिये मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है ।।७।।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। 
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।

अर्थ-जो कुछ कर्म है, वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता ।।८।।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। 
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है-वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।९।।

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। 
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः।१०।।

अर्थ-जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता-वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरूष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है ।।१०।।

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। 
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।११।।

अर्थ-क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है ।।११।।


अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। 
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्।।१२।।

अर्थ-कर्मफल का त्याग न करनेवाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा-बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात् अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देनेवाले मनुष्यों के कर्मों का किसी काल में भी नहीं होता  ।।१२।।
                     
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। 
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।

अर्थ-हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अन्त करने के लिये उपाय बतलाने वाले सांख्यशास्त्र में कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान ।।१३।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। 
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

अर्थ-इस विषय में अर्थात् कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव है।।१४।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। 
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

अर्थ-मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है - उसके ये पाँचो कारण हैं।।१५।।
                     
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। 
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

अर्थ-परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्धस्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।।१६।।

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। 
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।१७।।

अर्थ-जिस पुरुष के अन्तःकरण 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बँधता है ।।१७।।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। 
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।।१८।।

अर्थ-ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय -ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता, करण तथा क्रिया - ये तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है।।१८।।
                     
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। 
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।।१९।।

अर्थ-गुणों की संख्या करनेवाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद तीन-तीन प्रकार के ही कहे गये हैं, उनको भी तू मुझसे भलीभाँति सुन।।१९।।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। 
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।२०।।

अर्थ-जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मा भाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्विक जान।।२०।।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। 
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।२१।।

अर्थ-किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।।२१।।
                     
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। 
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

अर्थ-परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त हैं तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है-वह तामस कहा गया है ।।२२।।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। 
अफलप्रैप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते।।२३।।

अर्थ-जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा विना राग-द्वेष के किया गया हो - वह सात्विक कहा जाता है ।।२३।।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। 
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।।

अर्थ-परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।।२४।।
                     
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। 
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।

अर्थ-जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।।२५।।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। 
सिद्ध्यसिध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ।।२६।।

अर्थ-जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष-शोकादि विकारों से रहित है-वह सात्विक कहा जाता है।।२६।।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। 
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।२७।।

अर्थ-जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है- वह राजस कहा गया है।।२७।।
                     
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। 
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते।।२८।।

अर्थ-जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करनेवाला तथा शोक करनेवाला, आलसी और दीर्घसूत्री है-वह तामस कहा जाता है।।२८।।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु। 
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय।।२९।।

अर्थ-हे धनञ्जय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन ।।२९।।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। 
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्विकी।।३०।।

अर्थ-हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्षको यथार्थ जानती है-वह बुद्धि सात्विकी है।।३०।।
                     
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। 
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।३१।।

अर्थ-हे पार्थ ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ।।३१।।

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। 
सर्वर्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।३२।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।।३२।।

धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः। 
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।

अर्थ-हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी धारणशक्ति से मनुष्य ध्यानयोग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्विकी है ।।३३।।

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । 
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी।।३४।।

अर्थ-परन्तु हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा अत्यन्त आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है ।।३४।।
                     
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। 
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।

अर्थ-हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है-वह धारणशक्ति तामसी है ।।३५।।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ। 
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति।। 
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। 
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।३६-३७।।

अर्थ-हे भरतश्रेष्ठ ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन । जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है-जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होनेवाला सुख सात्त्विक कहा गया है।।३६-३७।।
                     
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। 
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।३८।।

अर्थ-जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले-भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।।३८।।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। 
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।

अर्थ-जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है-वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।।३९।।

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। 
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः।।४०।।

अर्थ-पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो ।।४०।।
                     
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।  
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।४१।।

अर्थ-हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं।।४१।।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। 
ज्ञानं विज्ञा‌नमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।४२।।

अर्थ-अन्तःकरण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्म पालन के लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा  करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना; वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्‍धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना - ये सबके सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।।४२।।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। 
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।

अर्थ-शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरति और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामीभाव- ये सबके-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।।४३।।
                     
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४।।

अर्थ-खेती, गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार-ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।।४४।।

स्वे-स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। 
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।४५।।

अर्थ-अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता हे। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन ।।४५।।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। 
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।४६।।

अर्थ-जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।।४६।।
                     
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परमधर्मात्स्वनुष्ठितात्। 
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्।।४७।।

अर्थ-अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है;क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ।।४७।।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। 
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

अर्थ-अतएव कुन्तीपुत्र ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।।४८।।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। 
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति।।४९।।

अर्थ-सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।।४९।।
                     
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। 
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।

अर्थ-जो कि ज्ञानयोग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार हे कुन्तीपुत्र ! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।।५०।।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। 
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।५१।।

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। 
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।५२।।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। 
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।५३।।

अर्थ-विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्विक और नियमित भोजन करनेवाला , शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करनेवाला, सात्विक धारण शक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यानयोग के परायण रहनेवाला, ममतारहित और शान्तियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है।।५१-५३।।
                       
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | 
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।।५४।।

अर्थ-फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मन वाला योगी न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही  करता है | ऐसा समस्त प्राणियों में समभाववाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है ।।५४।।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्र्चास्मि तत्त्वतः| 
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।५५।।

अर्थ-उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है; तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।।५५।।

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः| 
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।५६।।

अर्थ-मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।।५६।।
                     
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः| 
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।

अर्थ-सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धिरूप योग को अवलम्बन करके मेरे परायण और निरन्तर मुझ में चित्तवाला हो।।५७।।

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | 
अथ चेत्त्व महङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।

अर्थ-उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जायेगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जायेगा अर्थात् परमार्थ से भ्रष्ट हो जायेगा।।५८।।

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे | 
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।

अर्थ-जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा ।।५९।।
                     
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा | 
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ||६०।।

अर्थ-हे कुन्तीपुत्र ! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा ।।६०।।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति | 
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।

अर्थ-हे अर्जुन ! शरीररुप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है ।।६१।।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | 
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

अर्थ-हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा | उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा ।।६२।।
                     
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यागुह्यतरं मया | 
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।

अर्थ-इस प्रकार यह गोपनीय से भी गोपनीय ज्ञान मैने तुमसे कह दीया | अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचारकर, जैसे चाहता है वैसे कर।।६३।।

सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः| 
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।।

अर्थ-सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्तवचन को तू फिर भी सुन | तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा।।६४।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | 
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।।

अर्थ-हे अर्जुन ! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर | ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है ।।६५।।
                     
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | 
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।६६।।

अर्थ-सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा | मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ।।६६।।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | 
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।६७।।

अर्थ-तुझे ये गीतारूप रहस्यमय उपदेश किशी भी काल में न तो तप रहित मनुष्यों से कहना चाहिये, न भक्तिरहित से और न बिना सुनने की इच्छावाले से ही कहना चाहिये; तथा मुझमें दोषदृष्टि रखता है उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये।।६७।।

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति | 
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।।६८।।

अर्थ-जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है।।६८।।
                     
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः | 
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ।।६९।।

अर्थ-उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं ।।६९।।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं सम्वादमावयोः | 
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।७०।।

अर्थ-जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के सम्वादरूप गीताशास्त्र को पढे़गा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा-ऐसा मेरा मत है ।।७०।।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः| 
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

अर्थ-जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा ।।७१।।
                     
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा | 
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ।।७२।।

अर्थ-हे पार्थ ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया है ? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया ? ।।७२।।

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादिन्मयाच्युत | 
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ।।७३।।

अर्थ-अर्जुन बोले-हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।।७३।।

सञ्जय उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः | 
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।।७४।।

अर्थ-संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमाञ्चकारक संवाद को सुना ।।७४।।
                     
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् | 
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।७५।।

अर्थ-श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है ।।७५।।

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य सम्वादमिममद्भुतम् | 
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।

अर्थ-हे राजन ! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत् संवाद को पुनः -पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।।७६।।

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे | 
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ।।७७।।

अर्थ-हे राजन ! श्री हरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।।७७।।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः | 
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।

अर्थ-हे राजन ! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है-ऐसा मेरा मत है।।७८।।

ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिष्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टोषटादशोऽध्यायः ||१८||

जय बाबा की - शिवदास

Wednesday, November 27, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता सप्तदशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता सप्तदशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 
अर्जुन उवाच
                     
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। 
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले-हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्‍धा से युक्त हुए देवादि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है ? सात्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी ?।।१।।

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्‍धा देहिनां सा स्वभावजा। 
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्‍धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी -ऐसे तीनों प्रकार की होती है । उसको तू मुझसे सुन ।।२।।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। 
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

अर्थ-हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्‍धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्‍धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।।३।।

यजन्ते सात्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। 
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।४।।

अर्थ-सात्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।४।।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये  तपो जनाः। 
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।

अर्थ-जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।।५।।

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। 
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।

अर्थ-जो शरीर रूप से स्थित भूतसमुदाय को और अन्तः-करण में स्थित मुझ परमत्मा को भी कृश करनेवाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुर- स्वभाववाले जान।।६।।
                     
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। 
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।७।।

अर्थ-भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्-पृथक् भेद को तू मुझसे सुन।।७।।

आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः। 
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्याआहाराः सात्त्विकप्रियाः।।८।।

अर्थ-आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढा़ने-वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय-ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।।८।।

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। 
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।९।।

अर्थ-कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।९।।
                    
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। 
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।१०।।

अर्थ-जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।।१०।।

अफलाकाङि्क्षभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। 
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।११।।

अर्थ-जो शास्त्रविधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है-इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहनेवाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है ।।११।।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। 
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।१२।।

अर्थ-परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण के लिये अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान।।१२।।
                     
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणाम्। 
श्रद्‍धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।१३।।

अर्थ-शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्‍धा के किये जानेवाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।१३।।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। 
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।।

अर्थ-देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१४।।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। 
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।

अर्थ-जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१५।।
                   
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। 
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।

अर्थ-मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवचिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता-इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१६।।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। 
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।

अर्थ-फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्‍धा से किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्विक कहते हैं।।१७।।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। 
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

अर्थ-जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिये भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है ।।१८।।
                     
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। 
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।।

अर्थ-जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीडा़ के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है।।१९।।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। 
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।२०।।

अर्थ-दान देना ही कर्तव्य है-ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होनेपर उपकार न करनेवाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ।।२०।।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। 
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।२१।।

अर्थ-किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।।२१।।
                     
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। 
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

अर्थ-जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कार पूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।।२२।।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। 
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।।

अर्थ-ॐ, तत्, सत् - ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदघन ब्रह्म का नाम कहा है; उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये ।।२३।।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः। 
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।

अर्थ-इसलिये वेद-मन्त्रों का उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं ।।२४।।
                     
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। 
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।२५।।

अर्थ-तत् अर्थात् 'तत्' नाम से कहे जानेवाले परमात्मा का ही यह सब है-इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।।२५।।

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। 
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।२६।।

अर्थ-'सत्' - इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।।२६।।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। 
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।२७।।

अर्थ-तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्-ऐसे कहा जाता है।।२७।।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। 
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।

अर्थ-हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो भी किया हुआ शुभ कर्म है वह समस्त 'असत्'-इस प्रकार कहा जाता है; वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही ।।२८।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूप निषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्‍धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
जय बाबा की - शिवदास 

श्रीमद्भगवद्गीता - षोडशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता - षोडशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 

                     
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। 
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।१।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिये ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान् के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्मपालन के लिये कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता।।१।।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। 
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।।२।।

अर्थ-मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करनेवाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव ।।२।।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । 
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।। ।।३।।

अर्थ-तेत, क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि एवं किसी में भी शत्रुभाव न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।।३।।
                     
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। 
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।४।।

अर्थ-हे पार्थ ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी-ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।।४।।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। 
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।

अर्थ-दैवी सम्पदा मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिये मानी गयी है । इसलिये हे अर्जुन ! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।।५।।

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। 
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।६।।

अर्थ-हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृतिवाला और दूसरा आसुरी प्रकृतिवाला । उनमें से दैवी प्रकृतिवाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।।६।।
                     
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। 
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।७।।

अर्थ-आसुर-स्वभाववाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति-इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।।७।।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। 
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।८।।

अर्थ-वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है ?।।८।।

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। 
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।९।।

अर्थ-इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके-जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सबका अपकार करनेवाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत् के नाश के लिये ही समर्थ होते हैं।।९।।
                    
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। 
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता।।१०।।

अर्थ-वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं।।१०।।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। 
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः।।११।।

अर्थ-तथा वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेनेवाले, विषय-भोगों के भोगने में तत्पर रहनेवाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं।।११।।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। 
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।।१२।।

अर्थ-वे आशा की सैकडो़ं फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिये अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थ का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं।।१२।।
                     
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। 
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।१३।।

अर्थ-वे सोचा करते हैं कि मैने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायेगा।।१३।।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। 
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं फलवान्सुखी।।१४।।

अर्थ-वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्वर्य को भोगनेवाला हूँ। मैं सभी सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।।१४।।
                     
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। 
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। 
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।

अर्थ-मैं बडा़ धनी और बडे़ कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है ? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमाद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहनेवाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्तवाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं।।१५-१६।।
                     
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। 
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।१७।।

अर्थ-वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाम मात्र  के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं।।१७।।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। 
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।१८।।

अर्थ-वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करनेवाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं।।१८।।

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। 
क्षिपाम्यजस्रमशुभाना सुरीष्वेव योनिषु।।१९।।

अर्थ-उन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।।१९।।
                    
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। 
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।२०।।

अर्थ-हे अर्जुन ! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकों में पड़ते हैं।।२०।।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। 
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।२१।।

अर्थ-काम, क्रोध तथा लोभ-ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जानेवाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिये।।२१।।

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। 
आचारत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।२२।।

अर्थ-हे अर्जुन ! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है।।२२।।
                  
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। 
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।

अर्थ-जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।।२३।।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। 
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।२४।।

अर्थ-इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से नियत कर्म ही करनेयोग्य है।।२४।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः।।१६।।

 जय बाबा की - शिवदास

श्रीमद्भगवद्गीता - पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता - पञ्चदशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 

                     
उर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- आदिपुरुष परमेश्वररूप मूलवाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखावाले जिस संसाररूप पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गये हैं-उस संसाररूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित तत्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।।१।।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। 
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।२।।

अर्थ-उस संसारवृक्ष की तीनों गुणोंरूप जलके द्वारा बढी़ हुई एवं विषय-भोगरुप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य-लोकमें कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली अहंता-ममता और वासनारूप जडे़ं भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं।।२।।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। 
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गेशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।।

अर्थ-इस संसारवृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचारकाल में नहीं पाया जाता, क्योंकि न तो इसका आदि है और न अन्त है तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है। इसलिये इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्रद्वारा काटकर-।।३।।
                     
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। 
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।४।।

अर्थ-उसके पश्चात् उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसारवृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ-इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिये।।४।।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। 
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।५।।

अर्थ-जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्णरूप से नष्ट हो गयी है-वे सुखदुःख नामक द्वन्दों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं।।५।।

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। 
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।६।।

अर्थ-जिस परमपद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परमधाम है।।६।।
                 
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। 
मनःषष्ठानीन्द्रियाणिप्रकृतिस्थानि कर्षति।।७।।

अर्थ-इस देह में सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षण करता है।।७।।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। 
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गंधानिवाशयात्।।८।।

अर्थ-वायु गंध के स्थान से गंधको जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है-उसमें जाता है ।।८।।

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शन च रसेनं घ्राणमेव च। 
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।।९।।

अर्थ-यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके-अर्थात् इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है।।९।।

                     
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। 
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।१०।।

अर्थ-शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को  भी अज्ञानी जन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेक शील ज्ञानी ही तत्व से जानते हैं।।१०।।

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। 
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।११।।

अर्थ-यत्न करनेवाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्व से जानते हैं; किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।।११।।

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्। 
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्।।१२।।

अर्थ-सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है-उसको तू मेरा ही तेज जान।।१२।।

                     
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। 
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।१३।।

अर्थ-और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।।१३।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। 
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।१४।।

अर्थ-मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहनेवाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्निरूप होकर चार प्राकार के अन्न को पचाता हूँ।।१४।।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। 
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।१५।।

अर्थ-मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रेप से स्थित हूँ तथा मुझमें ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।।१५।।
                     
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। 
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।१६।।

अर्थ-इस संसार में नाशवान् और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष हैं । इनमें सम्पूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो नाशवान् और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।।१६।।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। 
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।१७।।

अर्थ-इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा-इस प्रकार कहा गया है।।१७।।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। 
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।१८।।

अर्थ-क्योंकि मैं नाशवान् जडवर्ग-क्षेत्रसे तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।।१८।।

                     
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। 
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।।१९।।

अर्थ-भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है।।१९।।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। 
एत्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

अर्थ-हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान् और कृतार्थ हो जाता है।।२०।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः।।१५।।
 जय बाबा की -  शिवदास 

श्रीमद्भगवद्गीता - चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता - चतुर्दशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 

श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। 
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-ज्ञानों में भी अति उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं ।।१।।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। 
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।२।।

अर्थ-इस ज्ञान को आश्रय  करके अर्थात् धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में भी व्याकुल नहीं होते।।२।।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। 
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३।।

अर्थ-हे अर्जुन ! मेरी महत्-ब्रह्मरूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात् गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।।३।।
                     
सर्वयोनेषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। 
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।४।।

अर्थ-हे अर्जुन ! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सभी गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ।।४।।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । 
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

अर्थ-हे अर्जुन! सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये सब प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।।५।।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाश कमनामयम् । 
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।६।।

अर्थ-हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करनेवाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात् उसके अभिमान से बाँधता है।।६।।
                     
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । 
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ।।७।।

अर्थ-हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान । वह इस जीवात्मा को कर्मों के और उनके फल के सम्बन्ध से बाँधता है।।७।।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। 
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।।८।।

अर्थ-हे अर्जुन ! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान । वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है ।।८।।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। 
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।९।।

अर्थ-हे अर्जुन ! सत्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।।९।।
                     
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। 
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।।

अर्थ-हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है।।१०।।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। 
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

अर्थ-जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढा़ है।।११।।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। 
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।।

अर्थ-हे अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषयभोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं।।१२।।
                     
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। 
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।१३।।

अर्थ-हे अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ-ये सब ही उत्पन्न होते हैं।।१३।।

यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। 
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिप्रपद्यते।।१४।।

अर्थ-जब यह मनुष्य सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करनेवालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।१४।।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। 
तथा प्रलनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।।

अर्थ-रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्तिवाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है; तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है।।१५।।
                     
कर्मणः सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम्। 
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।१६।।

अर्थ-श्रेष्ठ कर्म का सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है; राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है।।१६।।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। 
प्रमादमोहो तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।१७।।

अर्थ-सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निस्सन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है।।१७।।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। 
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।१८।।

अर्थ-सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्यलोक में ही रहते हैं और तमगुण के कार्यरुप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।।१८।।

                     
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। 
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।।

अर्थ-जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।१९।।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। 
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।२०।।

अर्थ-यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लघंन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।।२०।।

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। 
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।२१।।

अर्थ-अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो ! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है ?।।२१।।

 श्रीभगवानुवाच
                 
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।  
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।।२२।।

अर्थ-श्रीभगवान बोले-हे अर्जुन ! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत होने पर उनकी आकांक्षा करता है।।२२।।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।  
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते।।२३।।

अर्थ-जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते हैं -ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता ।।२३।।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। 
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्म संस्तुतिः।।२४।।

अर्थ-जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समानभाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समानभाव वाला है ।।२४।।
                   
मानापमानयोस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। 
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।२५।।

अर्थ-जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।२५।।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। 
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्म भूयाय कल्पते।।२६।।

अर्थ-और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिये योग्य बन जाता है।।२६।।

ब्रहम्णो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। 
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।२७।।

अर्थ-क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृत का तथा नित्यधर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ।।२७।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः
जय बाबा की - शिवदास

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः  संकलन - शिवदास  अर्जुन उवाच                   सन्नासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।  त्या...