Sunday, March 24, 2019

Pancham Adhyaya

 श्रीमद्भगवद्गीता  पञ्चमो  अध्यायः 
संकलन - शिवदास 

अर्जुन उवाच
                     
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। 
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले- हे कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं । इसलिये इन दोनों में से जो एक मेरे लिये भलीभाँति निश्चित कल्याण कारक साधन हो, उसको कहिये।।१।।


श्रीभगवानुवाच
            
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। 
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

श्रीभगवान् बोले - कर्मसंन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्मसंन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है ।।२।।

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। 
निर्द्वन्दो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।३।। 

हे अर्जुन ! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है ; क्यों कि राग-द्वेषादि द्वन्दों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है।।३।।


साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। 
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

अर्थ-उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्खलोग पृथक्-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फल स्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है।।४।।
         
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। 
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।५।।

ज्ञा‌नयोगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है । इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।।५।।

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। 
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।६।। 


परन्तु हे अर्जन ! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों  में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।।६।।
                     
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। 
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।७।।

अर्थ-जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसकाआत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता है ।।७।।
         
नैव किञ्चत्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्। 
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्र्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्।।८।।

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।९।। 

तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने - अपने अर्थों में बरत रही हैं - इस प्रकार समझकर निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ।।८-९।।

                     
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। 
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।१०।।

अर्थ-जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।।१०।।
         
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि। 
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।११।।

कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय,मन,बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अन्तःकरण की शुद्धि के लिये कर्म करते हैं।।११।।

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। 
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।१२।। 

कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकाम-पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है ।।१२।।
                
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी। 
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।।

अर्थ-अन्तःकरण जिसके वश में है ऐसा सांख्ययोग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारोंवाले शरीररूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।।१३।।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। 
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्ता‌पन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की ही रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। 
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मूह्यन्ति जन्तवः।।१५।। 

सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पापकर्म को और न किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।।१५।।
                 
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। 
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ।।१६।।

अर्थ-परन्तु जिनका वह अज्ञा‌न परमात्मा के तत्वज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है ।।१६।।

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। 
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।१७।।

जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरन्तर एकीभाव से स्थित है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान के द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात् परमगति को प्राप्त होते हैं।।१७।।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। 
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।१८।। 


वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं ।।१८।।
              
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। 
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः।।१९।।

अर्थ- जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा मे॑ ही स्थित हैं ।।१९।।

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेतप्राप्य चाप्रियम्। 
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।।२०।।

जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है।।२०।।

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। 
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।२१।। 

बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनन्द है, उसको प्राप्त होता है; तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्नभाव से स्थित पुरुष अक्षय  आनन्द का अनुभव करता है।।२१।।

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। 
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।२२।।

अर्थ-जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं तो भी दुख के ही हेतु हैं और आदि-अन्त वाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।।२२।।

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। 
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।२३।।

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है।।२३।।

योअन्तःसुखोअन्तरारामस्थान्तर्ज्योतिरेव यः। 
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोअधिगच्छति।।२४।। 

जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञानवाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्ययोगी शान्तब्रह्म को प्राप्त होता है।।२४।।

                     
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। 
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।२५।।

अर्थ-जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभावसे परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।।२५।।

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। 
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।२६।।

कामक्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं।।२६।।

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। 
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।२७।।

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। 
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।।२८।। 

बाहर के विषय-भोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीचमें स्थित करके तथा नाशिका में विचरणे वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुयी हैं, ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है ।।२७-२८।।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। 
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ।।२९।।


मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगनेवाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृदय अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है ।।२९।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्नसयोगो नाम पञ्चमोअध्यायः ।।५।।


ॐ जय बाबा की ॐ || शिवदास || 


Saturday, March 16, 2019

Chaturth Adhyaya -4

श्रीमद्भगवद्गीता  चतुर्थो अध्यायः 
संकलन श्री शिवदास 

श्रीभगवानुवाच
                     
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवाहनमव्ययम्। 
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत् ।।१।।

अर्थ-श्री भगवान् बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था; सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा ।।१।।   

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

अर्थ-हे परंतप अर्जुन ! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वीलोक में लुप्त हो गया ।।२।।

स एवायं मया तेअद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। 
भक्तोअसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।३।। 

अर्थ-तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है ;क्योंकि यह ,बडा़ ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।।३।।

अर्जुन उवाच
                     
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। 
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

अर्थ-अर्जुन बोले-आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हालका है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था । तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यहयोग कहा था ? ।।४।।

श्रीभगवानुवाच
            
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं । उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।।५।।

अजोअपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोअपि सन् । 
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।। 

अर्थ-मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकृट होता हूँ ।।६।।
                     
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।।

अर्थ-हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकृट होता हूँ ।।७।।
            
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।८।।

अर्थ-साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ ।।८।।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोअर्जुन।।९।। 

अर्थ-हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं-इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है ।।९।।
               
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। 
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।१०।।

अर्थ-पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरेस्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।।१०।।
            
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 
मम वर्त्मानुर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।११।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ।।११।।

कङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। 
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।१२।। 

अर्थ-इस मनुष्यलोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं; क्यों कि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है ।।१२।।
               
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।  
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।।१३।।

अर्थ- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्मका कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तूवास्तव में अकर्ता ही जान।।१३।।
            
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। 
इति मां योअभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।१४।।

अर्थ-कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं  करते-इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बधँता ।।१४।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। 
कुरु कर्मैव तत्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।१५।। 

अर्थ-पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं । इसलिये तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही कर ।।१५।।

           किं कर्म किमकर्मेति कवयोअप्यत्र मोहिताः। 
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेअशुभात्।।१६।।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणिः। 
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

अर्थ-कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।।१७।।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। 
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।१८।। 

अर्थ-जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है ।।१८।।
                     
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। 
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।१९।।

अर्थ-जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञा‌नरूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुष को ज्ञा‌नीजन भी पण्डित कहते हैं।।१९।।
            
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। 
कर्मण्यभिप्रवृत्तोअपि नैव किञ्चित्करोति सः ।।२०।।

अर्थ-जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवातमेंकुछ भी नहीं करता । ।२०।।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। 
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोतिकिल्बिषम् ।।२१।।
अर्थ-जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आसारहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी  पापों को नहीं प्राप्त होता।।२१।।
                 
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। 
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ।।२२।।

अर्थ-जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा सन्तुष्ट  रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि मेंसम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता ।।२२।।

            
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। 
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ।।२३।।    

अर्थ-जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञा‌न में स्थित रहता है-ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिये कर्म करने वाले मनुष्य केसम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं ।।२३।।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। 
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।।२४।। 

अर्थ-जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात् स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है-उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।।२४।।
                     
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।  
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ।।२५।।

अर्थ-दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेददर्शनरूप यज्ञ के द्वारा ही आत्मरुप यज्ञ का हवन किया करते हैं।।२५।।
            
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। 
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।।२६।।

अर्थ-अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयमरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रियरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं ।।२६।।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । 
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।२७।। 

अर्थ-दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञा‌न से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं ।।२७।।
                   
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। 
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।२८।।

अर्थ-कई पुरुष द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं,कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञा‌नयज्ञ करने वाले हैं ।।२८।।
            
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेअपानं तथापरे। 
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।२९।।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। 
सर्वेअप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।३०।।  

अर्थ-दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं । ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।।२९-३०।।
                     
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।  
नायं लोकोअस्त्ययज्ञस्य कुतोअन्यः कुरुसत्तम।।३१।।

अर्थ-हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं । और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिये तोयह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ? ।।३१।।
            
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। 
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।३२।।

अर्थ-इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं । उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तूकर्मबन्धन से सर्वथा मुक्त हो जायगा ।।३२

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। 
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञा‌ने परिसमाप्यते।।३३।। 

अर्थ-हे परन्तप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं ।।३३।।

                     
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । 
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।३४।।

अर्थ-उस ज्ञानको तू तत्वदर्शी ज्ञा‌नियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्नकरने से वे परमात्मतत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञा‌नी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेगें।।३४।।
            
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। 
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।३५।।

अर्थ-जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन ! जिस ज्ञान के द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में और पीछे मुझसच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा ।।३५।।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। 
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।३६।। 

अर्थ-यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है; तो भी तू ज्ञानरूप नौकाद्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायगा।।३६।।
                     
यथैधांसि समिद्धोअग्निर्भस्मसात्कुरुतेअर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।३७।।

अर्थ-क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है ।।३७।।
            
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । 
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ।।३८।।

अर्थ-इस संसार में ज्ञा‌न के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है ।।३८।।

श्रद्‍धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। 
ज्ञा‌नं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।। 

अर्थ-जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्‍धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञा‌न को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के - तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।।३९।।
                     
अज्ञच्ज्ञाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। 
नायं लोकोअस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।४०।।

अर्थ-विवेकहीन और श्रद्‍धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है ।।४०।।

            
योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। 
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।४१।।

अर्थ-हे धनञ्जय ! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किये हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहींबाँधते।।४१।।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। 
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।४२।। 

अर्थ-इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! तू हृदय में स्थित इस अज्ञान जनित अपने संशय का विवेक ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिये खडा़ होजा ।।४२।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्नयासयोगो नाम चतुर्थोअध्यायः।। ४।।


ॐ जय बाबा की ॐ 
|| शिवदास || 

Bhagwat Geeta Adhyay 3

श्रीमद्भगवद्गीता  तृतीयो अध्यायः
|| संकलन  - शिवदास || 
अर्जुन उवाच
                   
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ।।१।।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोअहमाप्नुयाम् ।।२।।

श्रीभगवानुवाच

लोकेअस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३।।

अर्थ-अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं ? आप मिले हुए से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं । इसलिये उस एक बात को निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ । श्री भगवान् बोले- हे निष्पाप ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है । उनमें से सांख्ययोगियों की निष्ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है ।।१-३।।
                   
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोअश्रुते।
न च सन्नसनादेव सिद्धि समधिगच्छति।।४।।
         
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।५।।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।६।।

अर्थ-मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है। निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिये बाध्य किया जाता है। जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है ।।४-६।।
                   
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेअर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।७।।
         
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।८।।

यज्ञार्थात्कर्मणोअन्यत्र लोकोअयं  कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचार।।९।।

अर्थ-किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है। तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा। यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिये हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्यकर्म कर ।।७-९।।
                   
सहयज्ञाः प्रज्ञा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोअस्त्विष्टकामधुक्।।१०।।
         
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।११।।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।१२।।

अर्थ-प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थभाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। यज्ञ के द्वारा बढा़ये हुए देवता तुमलोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।।१०-१२।

                   
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।१३।।

 अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।१४।।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भव्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।१५।।

अर्थ-यज्ञ से बचे हुये अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिये ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं। सर्म्पूण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं , अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।।१३-१५।

                   
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवित।।१६।।

 यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।।१७।।

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।१८।।

अर्थ- हे पार्थ ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों मे रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करनेवाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है। उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है। तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता।।१६-१८।

                   
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचार।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।१९।।

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।२०।।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।२१।।

अर्थ-इसलिये तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भलीभाँति करता रह । क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है ।।१९।

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिये तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है ।।२०।।

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है ।।२१।।

                   
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।२२।।

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।२३।।

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।२४।।

अर्थ-हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ ।।२२।

क्योंकि हे पार्थ ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बडी़ हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।।२३।।

इसलिये यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।।२४।।

                   
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुलोकसङ्ग्रहम्।।२५।।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।।२६।।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।

अर्थ- हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म हैं, आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार करे।।२५।

परमात्मा के स्वरुप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्तिवाले  अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे।।२६।।

वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है ।।२७।।
                   
तत्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ।।२८।।

प्रकृतेर्गुणसम्मूढा़ सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ।।२९।।

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।३०।।

अर्थ-परन्तु हे महाबाहो ! गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।।२८।

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे ।।२९।।

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर ।।३०।।

                   
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोअनसूयन्तो मुच्यन्ते तेअपि कर्मभिः।।३१।।

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढा़स्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।।३२।।

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।३३।।

अर्थ-जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्‍धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं,  वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।।३१।

परन्तु जो मनुष्य मुझ में दोषारोपण करते हुये मेरे मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुये ही समझ।।३२।।

सभी प्राणी प्रकृति को ही प्राप्त होते हैं, अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुये कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा ? ।।३३।।

                   
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।३४।।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं शक्र परधर्मो भयावहः।।३५।।

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोअयं पापं चरित पूरुषः।
अनिच्छान्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।३६।।

अर्थ-इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुये स्थित हैं । मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं रहना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं ।।३४।

अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है ।।३५।।

अर्जुन उवाच

अर्जुन बोले-हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुये की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?।।३६।।

श्रीभगवानुवाच
                   
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्।।३७।।

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।३८।।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।३९।।

श्रीभगवानुवाच

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगों से कभी न अघानेवाला और बडा़ पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान ।।३७।

जिस प्रकार धूँए से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है।।३८।।

और हे अर्जुन ! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाला कामरुप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका रहता है।।३९।।



इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञा‌नमावृत्य देहिनम्।।४०।।
                   
तस्मात्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्योनं ज्ञानविज्ञा‌ननाशनम्।।४१।।

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।४२।।

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरुपं दुरासदम्।।४३।।

अर्थ-इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-ये सब इसके वास स्थान कहे जाते हैं। यह काम इन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।।४०।।


इसलिये हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञा‌न का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल ।।४१।

इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं; इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है ।।४२।।

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान् और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामरुप दुर्जय शत्रु को मार डाल।।४३।।

ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगे नाम तृतीयोध्यायः ।।३।।
|| संकलन  - शिवदास || 

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः  संकलन - शिवदास  अर्जुन उवाच                   सन्नासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।  त्या...