Friday, July 19, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता -त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता -त्रयोदशोऽध्यायः 
श्रीभगवानुवाच
संकलन - शिवदास 
                
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। 
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।१।।

अर्थ-श्रीभगवान बोले-हे अर्जुन ! यह शरीर 'क्षेत्र' इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्वों को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं ।।१।।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। 
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।२।।

अर्थ-हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान  और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात् विकारसहित प्रकृति का और पुरुष का जो तत्व से जानना है, वह ज्ञान है -ऐसा मेरा मत है।।२।।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकार यतश्च यत्। 
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।३।।

अर्थ-वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस कारण से जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाव वाला है-वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।।३।।
                     
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। 
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः।।४।।

अर्थ-यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।।४।।

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। 
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।५।।

अर्थ-पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियां, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध-।।५।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः। 
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।६।।

अर्थ-तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड चेतना और धृति-इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया ।।६।।
                  
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। 
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।७।।

अर्थ-क्षेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्‍धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह ।।७।।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च । 
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।८।।

अर्थ-इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना ।।८।।

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। 
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोप पत्तिषु।।९।।

अर्थ-पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना ।।९।।
                   
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। 
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।१०।।

अर्थ-मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना ।।१०।।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञा‌नं यदतोऽन्यथा।।११।।

अर्थ-अध्यात्मज्ञान में नित्यस्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना-यह सब ज्ञा‌न है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है- ऐसा कहा है ।।११।।

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। 
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१२।।

अर्थ-जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा । वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही ।।१२।।
                     
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिखरो मुखम् । 
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।१३।।

अर्थ-वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कान वाला है। क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।।१३।।

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। 
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

अर्थ-वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगनेवाला है ।।१४।।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। 
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।१५।।

अर्थ-वह चराचर सब भूतों बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है तथा अति समीप में और दूर में भी स्थित वही है।।१५।।
                     
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। 
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।१६।।

अर्थ-वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करनेवाला और रुद्ररूप से संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है ।।१६।।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। 
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

अर्थ-वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोध स्वरूप, जानने योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विषेशरूप से स्थित है।।१७।।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। 
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।१८।।

अर्थ-इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया । मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है ।।१८।।
                     
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। 
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।१९।।

अर्थ-प्रकृति और पुरुष-इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।।१९।।

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। 
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२०।।

अर्थ-कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तापन में अर्थात् भोगने में हेतु कहा जाता है।।२०।।

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। 
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।२१।।

अर्थ-प्रकृति में स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।।२१।।
                     
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। 
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।२२।।

अर्थ-इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा ऐसा कहा गया है।।२२।।

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। 
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।२३।।

अर्थ-इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है, वह सब प्रकार से कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता ।।२३।।

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । 
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।२४।।

अर्थ-उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान के द्वारा हृदय में देखते हें; अन्य कितने ही ज्ञा‌नयोग के द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग के द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं।।२४।।
                     
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। 
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ।।२५।।

अर्थ-परन्तु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्दबुद्धि वाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात् तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसन्देह तर जाते हैं।।२५।।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। 
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।२६।।

अर्थ-हे अर्जुन ! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षैत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान।।२६।।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तिं परमेश्वरम्। 
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।२७।।

अर्थ-जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है।।२७।।

                     
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। 
न हिनस्त्यमनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।।

अर्थ-क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।२८।।

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। 
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।।२९।।

अर्थ-और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।।२९।।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थ मनुपश्यति । 
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३०।।

अर्थ-जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक्-पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण  वह  सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।।३०।।

                  
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः। 
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

अर्थ-हे अर्जुन ! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।।३१।।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। 
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।।

अर्थ-जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता ।।३२।।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। 
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।३३।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।३३।।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । 
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ।।३४।।

अर्थ-इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा कार्यसहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान-नेत्रों द्वारा तत्वसे जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।।३४।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः।।१३।।

जय बाबा की - शिवदास

श्रीमद्भगवद्गीता -द्वादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता -द्वादशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 
अर्जुन उवाच
                    
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। 
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले- जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुणरूप  परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अति श्रेष्ठभाव से भजते हैं-उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन है ?।।१।।

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। 
श्रद्‍धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन- ध्यान में लगे हुये जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्‍धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ।।२।।

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। 
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।।३।।

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। 
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।४।।

अर्थ-परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भलीप्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीयस्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समानभाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं ।।३-४।।
     
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। 
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।।

अर्थ-उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।।५।।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः। 
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।६।।

अर्थ-परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं।।६।।

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। 
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।७।।

अर्थ-हे अर्जुन ! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करनेवाला होता हूँ।।७।।
                     
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। 
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।८।।

अर्थ-मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा; इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।८।।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। 
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।९।।

अर्थ-यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन ! अभ्यासररूप योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिये इच्छा कर ।।९।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। 
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

अर्थ-यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा ।।१०।।
                
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। 
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

अर्थ-यदि मेरी प्राप्तिरूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर ।।११।।

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। 
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

अर्थ-मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।।१२।।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। 
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः। 
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१४।।

अर्थ-जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवाले को भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है- वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है ।।१३-१४।।
                     
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। 
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।

अर्थ-जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादि से रहित है - वह भक्त मुझको प्रिय है।।१५।।

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। 
सर्वारम्भपरित्यागी यो मदभक्तः स मे प्रियः।।१६।।

अर्थ-जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है-वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।।१६।।

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। 
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।१७।।

अर्थ-जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है-वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।।१७।।
                     
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। 
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।१८।।

अर्थ-जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्दों में सम है और आसक्ति से रहित है।।१८।।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। 
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।१९।।

अर्थ-जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही सन्तुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है-वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।।१९।।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। 
श्रद्‍दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।२०।।

अर्थ-परन्तु जो श्रद्‍धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं ।।२०।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः।।१२।।


जय बाबा की -  शिवदास

Thursday, July 18, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता - अथैकादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता - अथैकादशोऽध्यायः 

अर्जुन उवाच
                   
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्। 
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले-मुझपर अनुग्रह करने के लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है।।१।।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। 
त्वत्तः कमलपत्राक्ष  माहात्म्यमपि चाव्ययम्।।२।।

अर्थ-क्योंकि हे कमलनेत्र ! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।।२।।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। 
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।३।।

अर्थ-हे परमेश्वरं ! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है; परन्तु हे पुरुषोत्तम ! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।३।।
                     
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। 
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्।।४।।

अर्थ-हे प्रभो ! यदि मेरे द्वारा आपका वह रुप देखा जाना शक्य है-ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइये।।४।।

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्त्रशः। 
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।।५।।

अर्थ-श्रीभगवान बोले- हे पार्थ ! अब तू मेरे सैकडो़ं हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख ।।५।।

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा। 
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।।६।।

अर्थ-हे भरतवंशी अर्जुन ! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को , आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख ।।६।।
                     
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्। 
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।।७।।

अर्थ-हे अर्जुन ! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख ।।७।।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। 
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।८।।

अर्थ-परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसन्देह समर्थ नहीं है; इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ; इससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।।८।।

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः। 
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।९।।

अर्थ-संजय बोले-हे राजन ! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करनेवाले भगवान् ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखलाया।।९।।

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्। 
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।१०।।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम्।।११।।

अर्थ-अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को हाथ में उठाये हुए, दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य दिव्य गन्ध का सारे शरीर में लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुये विराट् स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।।१०-११।।


दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। 
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।१२।।

अर्थ-आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो ।।१२।।
                     
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। 
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।१३।।

अर्थ-पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान् के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।।१३।।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। 
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।१४।।

अर्थ-उसके अनन्तर वे आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्तिसहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले।।१४।।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्। 
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।।१५।।

अर्थ-अर्जुन बोले- हे देव ! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।।१५।।
                     
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूपम्।।१६।।

अर्थ-हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन ! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप ! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही।।१६।।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्। 
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्।।१७।।

अर्थ-आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुञ्ज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ।।१७।।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। 
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।१८।।

अर्थ-आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है।।१८।।
                     
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्। 
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।१९।।

अर्थ-आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्यरूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतप्त करते हुए देखता हूँ।।१९।।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। 
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।२०।।

अर्थ-हे महात्मन ! यह स्वर्ग और पृथिवी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आप से ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।।२०।।

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति। 
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।२१।।

अर्थ-वे ही देवताओं के समूह आपमें प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोडे़ आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण' हो ऐसा कहकर उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।।२१।।
                     
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च। 
गन्धर्वयक्षासुरसिद्ध सङ्घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।२२।।

अर्थ-जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं।।२२।।

रुपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुरूपपादम्। 
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्।।२३।।

अर्थ-हे महाबाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले, बहुत उदरोंवाले  और बहुत सी दाढो़ं के कारण अत्यन्त विकराल महान् रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।।२३।।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तिविशालनेत्रम्। 
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।२४।।

अर्थ-क्योंकि हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श करनेवाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णो से युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशालनेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।।२४।।
                     
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। 
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।।२५।।

अर्थ-दाढो़ के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों।।२५।।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः। 
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।२६।।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि | 
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।।२७।।

अर्थ-वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सब के सब आपके दाढो़ के कारण विकराल भयानक मुखों में बडे़ वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दीख रहे हैं।।२६-२७।
                     
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। 
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्तु वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।२८।।

अर्थ-जैसे नदियों के बहुत से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।।२८।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः|  
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।।२९।।

अर्थ-जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिये प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्लवेश करते हैं, वैसे ही ये सबलोग भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।।२९।।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। 
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।।३०।।

अर्थ-आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट लहे हैं, हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।।३०।।
                     
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद। 
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।।३१।।

अर्थ-मुझे बतलाईये कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं ? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो । आप प्रसन्न होईये। आदिपुरुष आपको मैं विषेशरूप से जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।।३१।।

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। 
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ।।३२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- मैं लोकों का नाश करनेवाला बढा़ हुआ महाकाल हूँ । इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। इसीलिये जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जायेगा।।३२।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। 
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।३३।।

अर्थ-अतएव तू उठ ! यश को प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग । ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे द्वारा मारे हुए हैं । हे सव्यसाचिन् ! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।।३३।।
                     
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्। 
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।।३४।।

अर्थ-द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार । भय मत कर । निःसन्देह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिये युद्ध कर।।३४।।

सञ्जय उवाच

एतच्छुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। 
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।।३५।।

अर्थ-संजय बोले-केशव भगवान के इस बचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति गद्गद वाणी से बाले-।।३५।।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । 
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।३६।।

अर्थ-अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन् ! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं ।।३६।।
                     
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। 
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।३७।।

अर्थ-हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बडे़ आपके लिये वे कैसे नमस्कार न करें, क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! जो सत्, असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हैं, वह आप ही हैं।।३७।।

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। 
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।३८।।

अर्थ- आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।।३८।।

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रतितामहश्च। 
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।३९।।

अर्थ-आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं । आपके लिये हजारों बार नमस्कार ! नमस्कार हो!! आपके लिये बार-बार नमस्कार ! नमस्कार !!।।३९।।
                     
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। 
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।४०।।

अर्थ-हे अनन्त सामर्थ्यवाले ! आपके लिये आगे से और पीछे से भी नमस्कार है ! हे सर्वात्मन् ! आपके लिये सब ओर से ही नमस्कार हो । क्यों कि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुये हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं ।।४०।।

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । 
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।४१।।

यच्चावहासार्थम सत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु। 
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहप्रमेयम् ।।४२।।

अर्थ-आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण' ! हे यादव !, हे सखे ! इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा है और हे अच्युत् ! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं - वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ ।।४१-४२।।
                     
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। 
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।।४३।।

अर्थ-आप इस चराचर जगत् के पिता और सबसे बडे़ गुरु एवं अति पूजनीय हैं, हे अनुपम प्रभाववाले ! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।।४३।।

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । 
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।।४४।।

अर्थ-अतएव हे प्रभो ! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रशन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ । हे देव ! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।।४४।।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। 
तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास।।४५।।

अर्थ-मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिये आप उस अपने चतुर्भुज विष्णुरूप को ही मुझे दिखलाइये ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! प्रशन्न होइये।।४५।।
                     
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। 
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।।४६।।

अर्थ-मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिये हुए देखना चाहता हूँ, इसलिये हे विश्वरूप ! हे सहस्रबाहो ! आप उसी चतुर्भुजरूप से प्रकट होइये।।४६।।

श्रीभगवानुवाच

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। 
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।४७।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-हे अर्जुन ! अनुग्रहपूर्वक मैने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था ।।४७।।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। 
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।।४८।।

अर्थ-हे अर्जुन ! मनुष्यलोक में इस प्रकार विश्वरूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से , न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे के द्वारा देखा जा सकता हूँ।।४८।।
                     
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्। 
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।।।४९|| 

अर्थ-मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा- पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख।।४९।।

सञ्जय उवाच

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। 
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।।५०।।

अर्थ-संजय बोले-वासुदेवभगवान् ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया ।।५०।।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। 
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।।५१।।

अर्थ-अर्जुन बोले-हे जनार्दन ! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थित को प्राप्त हो गया हूँ।।५१।।


श्रीभगवानुवाच     
               
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। 
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।।५२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, यह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बडे़ ही दुर्लभ हैं । देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।।५२।।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। 
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।।५३।।

अर्थ-जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं न वेदों से, न तप से न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।।५३।।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। 
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टु च परन्तप।।५४।।

अर्थ-परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्यभक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्वसे जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिये भी शक्य हूँ।।५४।।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। 
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।५५।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्त्तव्य कर्मों का करनेवाला है, मेरे परायण हैं, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है ।।५५।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः।।११।।


 जय बाबा की -  शिवदास

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता अथाष्टादशोऽध्यायः  संकलन - शिवदास  अर्जुन उवाच                   सन्नासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।  त्या...