Wednesday, November 27, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता सप्तदशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता सप्तदशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 
अर्जुन उवाच
                     
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। 
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले-हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्‍धा से युक्त हुए देवादि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है ? सात्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी ?।।१।।

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्‍धा देहिनां सा स्वभावजा। 
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले-मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्‍धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी -ऐसे तीनों प्रकार की होती है । उसको तू मुझसे सुन ।।२।।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। 
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

अर्थ-हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्‍धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्‍धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।।३।।

यजन्ते सात्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। 
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।४।।

अर्थ-सात्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।४।।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये  तपो जनाः। 
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।

अर्थ-जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।।५।।

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। 
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।

अर्थ-जो शरीर रूप से स्थित भूतसमुदाय को और अन्तः-करण में स्थित मुझ परमत्मा को भी कृश करनेवाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुर- स्वभाववाले जान।।६।।
                     
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। 
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।७।।

अर्थ-भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्-पृथक् भेद को तू मुझसे सुन।।७।।

आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः। 
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्याआहाराः सात्त्विकप्रियाः।।८।।

अर्थ-आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढा़ने-वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय-ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।।८।।

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। 
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।९।।

अर्थ-कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।९।।
                    
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। 
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।१०।।

अर्थ-जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।।१०।।

अफलाकाङि्क्षभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। 
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।११।।

अर्थ-जो शास्त्रविधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है-इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहनेवाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है ।।११।।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। 
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।१२।।

अर्थ-परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण के लिये अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान।।१२।।
                     
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणाम्। 
श्रद्‍धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।१३।।

अर्थ-शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्‍धा के किये जानेवाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।१३।।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। 
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।।

अर्थ-देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१४।।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। 
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।

अर्थ-जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१५।।
                   
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। 
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।

अर्थ-मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवचिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता-इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।।१६।।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। 
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।

अर्थ-फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्‍धा से किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्विक कहते हैं।।१७।।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। 
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

अर्थ-जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिये भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है ।।१८।।
                     
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। 
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।।

अर्थ-जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीडा़ के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है।।१९।।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। 
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।२०।।

अर्थ-दान देना ही कर्तव्य है-ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होनेपर उपकार न करनेवाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ।।२०।।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। 
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।२१।।

अर्थ-किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।।२१।।
                     
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। 
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

अर्थ-जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कार पूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।।२२।।

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। 
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।।

अर्थ-ॐ, तत्, सत् - ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदघन ब्रह्म का नाम कहा है; उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये ।।२३।।

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः। 
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।

अर्थ-इसलिये वेद-मन्त्रों का उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं ।।२४।।
                     
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। 
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।२५।।

अर्थ-तत् अर्थात् 'तत्' नाम से कहे जानेवाले परमात्मा का ही यह सब है-इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।।२५।।

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। 
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।२६।।

अर्थ-'सत्' - इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।।२६।।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। 
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।२७।।

अर्थ-तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्-ऐसे कहा जाता है।।२७।।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। 
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।

अर्थ-हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो भी किया हुआ शुभ कर्म है वह समस्त 'असत्'-इस प्रकार कहा जाता है; वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही ।।२८।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूप निषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्‍धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
जय बाबा की - शिवदास 

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