Saturday, March 16, 2019

Chaturth Adhyaya -4

श्रीमद्भगवद्गीता  चतुर्थो अध्यायः 
संकलन श्री शिवदास 

श्रीभगवानुवाच
                     
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवाहनमव्ययम्। 
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत् ।।१।।

अर्थ-श्री भगवान् बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था; सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा ।।१।।   

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

अर्थ-हे परंतप अर्जुन ! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वीलोक में लुप्त हो गया ।।२।।

स एवायं मया तेअद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। 
भक्तोअसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।३।। 

अर्थ-तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है ;क्योंकि यह ,बडा़ ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।।३।।

अर्जुन उवाच
                     
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। 
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

अर्थ-अर्जुन बोले-आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हालका है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था । तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यहयोग कहा था ? ।।४।।

श्रीभगवानुवाच
            
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं । उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।।५।।

अजोअपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोअपि सन् । 
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।। 

अर्थ-मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकृट होता हूँ ।।६।।
                     
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।।

अर्थ-हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकृट होता हूँ ।।७।।
            
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।८।।

अर्थ-साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ ।।८।।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोअर्जुन।।९।। 

अर्थ-हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं-इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है ।।९।।
               
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। 
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।१०।।

अर्थ-पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरेस्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।।१०।।
            
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। 
मम वर्त्मानुर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।११।।

अर्थ-हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ।।११।।

कङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। 
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।१२।। 

अर्थ-इस मनुष्यलोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं; क्यों कि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है ।।१२।।
               
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।  
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्।।१३।।

अर्थ- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्मका कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तूवास्तव में अकर्ता ही जान।।१३।।
            
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। 
इति मां योअभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।१४।।

अर्थ-कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं  करते-इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बधँता ।।१४।।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। 
कुरु कर्मैव तत्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।१५।। 

अर्थ-पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं । इसलिये तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही कर ।।१५।।

           किं कर्म किमकर्मेति कवयोअप्यत्र मोहिताः। 
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेअशुभात्।।१६।।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणिः। 
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

अर्थ-कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।।१७।।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। 
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।१८।। 

अर्थ-जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है ।।१८।।
                     
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। 
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।१९।।

अर्थ-जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञा‌नरूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुष को ज्ञा‌नीजन भी पण्डित कहते हैं।।१९।।
            
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। 
कर्मण्यभिप्रवृत्तोअपि नैव किञ्चित्करोति सः ।।२०।।

अर्थ-जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवातमेंकुछ भी नहीं करता । ।२०।।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। 
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोतिकिल्बिषम् ।।२१।।
अर्थ-जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आसारहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी  पापों को नहीं प्राप्त होता।।२१।।
                 
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। 
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ।।२२।।

अर्थ-जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा सन्तुष्ट  रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि मेंसम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता ।।२२।।

            
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। 
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ।।२३।।    

अर्थ-जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञा‌न में स्थित रहता है-ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिये कर्म करने वाले मनुष्य केसम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं ।।२३।।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। 
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।।२४।। 

अर्थ-जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात् स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है-उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।।२४।।
                     
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।  
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ।।२५।।

अर्थ-दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेददर्शनरूप यज्ञ के द्वारा ही आत्मरुप यज्ञ का हवन किया करते हैं।।२५।।
            
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। 
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।।२६।।

अर्थ-अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयमरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रियरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं ।।२६।।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । 
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।२७।। 

अर्थ-दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञा‌न से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं ।।२७।।
                   
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। 
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।२८।।

अर्थ-कई पुरुष द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं,कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञा‌नयज्ञ करने वाले हैं ।।२८।।
            
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेअपानं तथापरे। 
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।।२९।।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। 
सर्वेअप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।३०।।  

अर्थ-दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं । ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।।२९-३०।।
                     
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।  
नायं लोकोअस्त्ययज्ञस्य कुतोअन्यः कुरुसत्तम।।३१।।

अर्थ-हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं । और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिये तोयह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ? ।।३१।।
            
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। 
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।३२।।

अर्थ-इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं । उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तूकर्मबन्धन से सर्वथा मुक्त हो जायगा ।।३२

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। 
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञा‌ने परिसमाप्यते।।३३।। 

अर्थ-हे परन्तप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं ।।३३।।

                     
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । 
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।३४।।

अर्थ-उस ज्ञानको तू तत्वदर्शी ज्ञा‌नियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्-प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्नकरने से वे परमात्मतत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञा‌नी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेगें।।३४।।
            
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। 
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।३५।।

अर्थ-जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन ! जिस ज्ञान के द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में और पीछे मुझसच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा ।।३५।।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। 
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।३६।। 

अर्थ-यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है; तो भी तू ज्ञानरूप नौकाद्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायगा।।३६।।
                     
यथैधांसि समिद्धोअग्निर्भस्मसात्कुरुतेअर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।३७।।

अर्थ-क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है ।।३७।।
            
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । 
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ।।३८।।

अर्थ-इस संसार में ज्ञा‌न के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है ।।३८।।

श्रद्‍धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। 
ज्ञा‌नं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।। 

अर्थ-जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्‍धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञा‌न को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के - तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।।३९।।
                     
अज्ञच्ज्ञाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। 
नायं लोकोअस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।४०।।

अर्थ-विवेकहीन और श्रद्‍धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है ।।४०।।

            
योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्। 
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।४१।।

अर्थ-हे धनञ्जय ! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किये हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहींबाँधते।।४१।।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। 
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।४२।। 

अर्थ-इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! तू हृदय में स्थित इस अज्ञान जनित अपने संशय का विवेक ज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिये खडा़ होजा ।।४२।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्नयासयोगो नाम चतुर्थोअध्यायः।। ४।।


ॐ जय बाबा की ॐ 
|| शिवदास || 

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