Friday, July 19, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता -द्वादशोऽध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता -द्वादशोऽध्यायः 
संकलन - शिवदास 
अर्जुन उवाच
                    
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। 
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।१।।

अर्थ-अर्जुन बोले- जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुणरूप  परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अति श्रेष्ठभाव से भजते हैं-उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन है ?।।१।।

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। 
श्रद्‍धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।२।।

अर्थ-श्रीभगवान् बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन- ध्यान में लगे हुये जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्‍धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ।।२।।

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। 
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।।३।।

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। 
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।४।।

अर्थ-परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भलीप्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीयस्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समानभाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं ।।३-४।।
     
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। 
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।।

अर्थ-उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।।५।।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः। 
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।६।।

अर्थ-परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं।।६।।

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। 
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।७।।

अर्थ-हे अर्जुन ! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करनेवाला होता हूँ।।७।।
                     
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। 
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।८।।

अर्थ-मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा; इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।८।।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। 
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।९।।

अर्थ-यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन ! अभ्यासररूप योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिये इच्छा कर ।।९।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। 
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

अर्थ-यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा ।।१०।।
                
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। 
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

अर्थ-यदि मेरी प्राप्तिरूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर ।।११।।

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। 
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

अर्थ-मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।।१२।।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। 
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः। 
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१४।।

अर्थ-जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवाले को भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है- वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है ।।१३-१४।।
                     
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। 
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।

अर्थ-जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादि से रहित है - वह भक्त मुझको प्रिय है।।१५।।

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। 
सर्वारम्भपरित्यागी यो मदभक्तः स मे प्रियः।।१६।।

अर्थ-जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है-वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।।१६।।

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। 
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।१७।।

अर्थ-जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है-वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।।१७।।
                     
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। 
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।१८।।

अर्थ-जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्दों में सम है और आसक्ति से रहित है।।१८।।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। 
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।१९।।

अर्थ-जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही सन्तुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है-वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।।१९।।

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। 
श्रद्‍दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।२०।।

अर्थ-परन्तु जो श्रद्‍धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं ।।२०।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः।।१२।।


जय बाबा की -  शिवदास

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